इंग्लैंड में व्यक्ति के मूल अधिकार
इंग्लैंड का संविधान अलिखित है। इसलिए इंग्लैंड में मूल अधिकारों की वैसी कोई संहिता नहीं है जैसी अमेरिका के संविधान में विश्व के अन्य लिखित संविधान में है। इसका यह अर्थ नहीं है कि इंग्लैंड में व्यक्ति के इन आधारभूत अधिकारों को कोई मान्यता है जिनके बिना लोकतंत्र अर्थहीन हो जाता है। इंग्लैंड में व्यक्तिगत अधिकारों का आधार नकारात्मक है। इस अर्थ में व्यक्ति को कोई भी कार्य जो वह चाहे करने का अधिकार और स्वतंत्रता है जब तक कि वह देश की सामान्य विधि के किसी नियम का उल्लंघन नहीं करता है। व्यक्ति की स्वतंत्रता न्यायिक विनिश्चय द्वारा सुनिश्चित की जाती है। इन न्यायिक निर्णयों में न्यायालय के समक्ष आए मामलों में व्यक्ति के अधिकार अवधारित किये जाते हैं।
इंग्लैंड में और अन्यत्र भी व्यक्ति के अधिकारों की संरक्षक न्यायपालिका है। किंतु इसमें एक मूलभूत अंतर है। इंग्लैंड में न्यायालयों को कार्यपालिका के अत्याचार के विरुद्ध व्यक्ति को संरक्षण देने की पूरी शक्ति है किंतु विधानमंडल के अधिकारों पर आक्रमण करता है तो न्यायालय शक्तिहीन हो जाते हैं। संक्षेप में इंग्लैंड के विधान मंडल के विरुद्ध आबद्धकर कोई मूल अधिकार नहीं है। इंग्लैंड की संसद सैद्वान्तिक रूप से सर्वशक्तिमान है। ऐसी कोई विधि नहीं है जिसे वह परिवर्तित ना कर सके। जैसा पहले कहा जा चुका है कि व्यक्ति को अधिकार है किन्तु वह देश की सामान्य विधि पर आधारित है जिसे संसद अन्य विधियों के सामान ही बदल सकती हैं। इसलिए ऐसा कोई अधिकार नहीं है जिसे वास्तविक अर्थ में मूल अधिकार कहा जा सके। संसद की सर्वोच्चता का एक और महत्वपूर्ण परिणाम यह होता है इंग्लैंड के न्यायालयों को विधान के न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति नहीं है। किसी भी विधि को इस आधार पर असंविधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह किसी मूल अधिकार है या नैसर्गिक अधिकार का उल्लंघन करती है।

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