मूल कर्तव्य
42वें संशोधन अधिनियम 1976 द्वारा एक प्रतितुलक प्रविष्टि की गई है अर्थात अनुच्छेद 51क में उल्लिखित मूल कर्तव्य। यह कर्तव्य न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नही है और उनका उल्लंघन दंडनीय भी नही है।
फिर भी वह न्यायालय जिसके समक्ष मूल अधिकार का प्रवर्तन किया जा रहा है संविधान के सभी भागों को पढ़ेगा और ऐसे व्यक्ति की प्रेरणा पर मूल अधिकार का प्रवर्तन करने से इंकार कर देगा जिसने अनुच्छेद 51क में विनिर्दिष्ट कर्तव्यों में से किसी का स्पष्ट उल्लंघन किया है। यदि ऐसा है तो मूल संविधान में मूल अधिकारों पर बल दिया गया था वह अब न्यून हो गया है।

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