भारत में मूल अधिकारों की मांग का इतिहास
भारत में साइमन आयोग और संयुक्त संसदीय समिति ने जो भारत शासन अधिनियम, 1935 के लिए उत्तरदायी थी। मूल अधिकारों की घोषणा को अधिनियमित करने के विचार को इस आधार पर नामंजूर कर दिया की अमूर्त घोषणाएं व्यर्थ होती हैं जब तक कि उन्हें प्रभावी करने की इच्छाशक्ति और साधन विद्यमान ना हो। किंतु नेहरू प्रतिवेदन के समय से राष्ट्रवादी राय अधिकार विलेख के पक्ष में निश्चित रूप से थी क्योंकि ब्रिटिश राज्य से जो अनुभव प्राप्त हुआ था वह यह था कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कम करने के चाटुकारों की विधायिका कार्यपालिका की सेवा करने के लिए तत्पर रहती थी। इसलिए ब्रिटिश राय की ओर ध्यान ना देते हुए संविधान निर्माताओं ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा के लिए और समाज के प्रत्येक सदस्य के लिए (निदेशक तत्वों के साथ-साथ) सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की प्राप्ति के लिए मूल अधिकार अंगीकार किये। वे अपने इस प्रयास में सफल हुए इस बात का साक्ष्य भारतीय संविधान के एक गहन अध्ययनकर्ता के कथन से प्राप्त होता है :
ऐसा प्रतीत होता है कि भारत में मूल अधिकारों ने एक नई समानता का सृजन किया है... और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने में सहायता की... उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के समक्ष अधिकार संबंधी वादों की संख्या को देखने से अधिकारों के मूल्य का भास होता है। परमाधिकार रिटों के बार-बार उपयोग से यह पता चलता है कि जनता ने उन्हें भली-भांति स्वीकार किया है। संविधान में उल्लेखित अधिकारों को सम्मिलित करने के विरुद्ध जो पारंपरिक तर्क दिए जाते हैं भारत में सही नहीं सिद्ध हुए। वस्तुतः इस मामले में इसका उल्टा ही है।

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