न्यायालयों को शक्ति मूल अधिकार के विषय में | Power to Courts Concerning Fundamental Rights


न्यायालयों को शक्ति मूल अधिकार के विषय में

भारत के संविधान में भाग 3 में बहुत से मूल अधिकार समाविष्ट किए हैं। ये (कुछ अपवादों के अधीन रहते हुए जिनका बाद में उल्लेख किया जाएगा) न केवल कार्यपालिका की बल्कि विधानमंडल की शक्तियों पर भी लगाई गई मर्यादाओं के रूप में है। यद्यपि इसका नमूना अमेरिका के संविधान से लिया गया है किंतु भारत का संविधान उससे बहुत आगे जाता है और एक प्रकार से संसदीय प्रभुता और न्यायिक सर्वोच्चता के सिद्धांतों के बीच एक सामंजस्य स्थापित करता है। दूसरी और भारत में संसद को उस अर्थ में प्रभुत्व संपन्न नहीं कहा जा सकता जिस अर्थ में इंग्लैंड की पार्लियामेंट को विधिक रुप से सर्वशक्तिमान माना जाता है। हमारी संसद की रचना लिखित संविधान द्वारा की गई है और उसमें उसकी मर्यादाएं हैं। हमारी संसद संविधान द्वारा अधिरोपित मर्यादाओं और प्रतिषेधों के अधीन विधान  बना सकती हैं, जैसे मूल अधिकार, विधायी शक्तियों का वितरण आदि। यदि इन मर्यादाओं को अतिक्रमण हो जाता है तो उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय इस बात के लिए सक्षम है कि वे किसी विधि को असंविधानिक और शून्य घोषित कर दे। जहां तक मूल अधिकारों के उल्लंघन का प्रश्न है यह कर्तव्य संविधान के न्यायालय को सौंपा है [अनुच्छेद 13]। यह अत्यधिक सावधानी के रूप में किया गया है। अनुच्छेद 13 का खण्ड 2 इस प्रकार है :

न्यायालयों को शक्ति मूल अधिकार के विषय में


राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छीनती है या न्यून करती है और इस खंड के उल्लंघन में बनाई गई प्रत्येक विधि उल्लंघन की मात्रा तक शून्य  होगी।

 इस विस्तार तक हमारा संविधान अमेरिकी आदर्श का अनुसरण करता है इंग्लैंड का नहीं। किन्तु भारत में विधानमंडल के अधिकारों को देखते हुए न्यायपालिका की शक्तियां अमेरिका की अपेक्षा दो बातों से कम है। 

(1)भारत के संविधान के अधीन मूल अधिकारों का अमेरिकी अधिकार विलेख से विभेद

अमेरिका के अधिकार विलय की घोषणा आत्यंतिक है। व्यक्ति के मूल अधिकारों पर समूह के हित में निर्बन्धन अधिरोपित करने की राज्य की शक्ति न्यायपालिका द्वारा विकसित की गई। भारत में प्रमुख मूल अधिकारों की दशा में यह शक्ति संविधान ने विधान मंडल को अभिव्यक्त रूप से प्रदान की है। विधानमंडल द्वारा अभी अधिरोपित निर्बंधनों की युक्तियुक्तता अवधारित करने के लिए न्यायिक पुर्नाविलोकन की शक्ति न्यायपालिका के हाथों में हैं।

(2) 44वा संशोधन अधिनियम,1978   Click here (यहाँ क्लिक करें)

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