44वा संशोधन अधिनियम,1978 : संपत्ति का अधिकार
श्री मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता सरकार ने जल्दबाजी में संविधान के 44वें संशोधन अधिनियम,1978 द्वारा अनुच्छेद 19(1)(च) और 31 का एक महत्वपूर्ण मूल अधिकार, संपत्ति के अधिकार, का लोप कर दिया। इस अनुच्छेद 31(1) का के उपबंध उसी संशोधन द्वारा एक नए अनुच्छेद - अनुच्छेद 300-क में रख दिए गए हैं। यह संविधान के भाग 3 के बाहर है और इसे भाग 12 के अध्याय 4 के रूप में दर्शाया गया है जो कि मूल अधिकार नहीं है (यह वित्त, संविदाएं,संपत्ति और वाद के बारे में है )।
30 वर्ष के कांग्रेस शासन में मूल संविधान के भाग 3 में समाहित मूल अधिकारों की परिधि को अनेक संशोधनों द्वारा धीरे-धीरे छोटा कर दिया गया है । किन्तु जनता सरकार ने एक मूल अधिकार को पूरा ही नष्ट कर दिया।
संपत्ति के अधिकार में जो संशोधन किए गए हैं उनका परिणाम यह है :
- विधि के प्राधिकार के बिना संपत्ति से वंचित ना किए जाने का अधिकार मूल अधिकार नही हैं। अतएव यदि किसी की संपत्ति विधि के प्राधिकार के बिना या विधि के उल्लंघन में कार्यपालिका की आज्ञा से ली जाती है तो व्यथित व्यक्ति के उच्चतम न्यायालय में अनुच्छेद 32 के अधीन आवेदन करने का कोई अधिकार नहीं होगा।
- यदि विधान मंडल किसी व्यक्ति को उसकी संपत्ति के से वंचित करने के लिए विधि बनाता है तो वह व्यक्ति अनुच्छेद 19(1)(च) के आधीन ऐसी विधि द्वारा अधिरोपित निर्बन्धन की युक्तियुक्त्ता पर आक्षेप नहीं कर सकता क्योंकि यह उपबंध अब विद्यमान नहीं है।
- अनुच्छेद 31 के खंड (2) का लोप हो गया है इसलिए किसी व्यक्ति की संपत्ति ले लिए जाने पर उसके प्रतिकर की बाबत उस व्यक्ति के संपत्ति के अधिकार के संबंध में विधानमंडल के विरुद्ध कोई प्रत्याभूति नहीं है(मूल संविधान में)। अनुच्छेद 31(2) में यह सिद्धांत समाविष्ट था कि यदि राज्य प्राइवेट संपत्ति का अनिवार्य अर्जन या अधिग्रहण करता है तो उसे (क) विधि बनानी होगी, (ख) ऐसी विधि लोक प्रयोजन के लिए होगी, और (ग) जिस व्यक्ति की संपत्ति ली गई है उसे कुछ प्रतिकार दिया जाना चाहिए।
- 1971 में 25वें संशोधन द्वारा श्रीमती इंदिरा गांधी के शासन में ''प्रतिकर'' के स्थान पर ''रकम'' शब्द रखा गया जिसकी पर्याप्तता के बारे में न्यायालय में आक्षेप नहीं किया जा सकता था। इतना होने पर भी उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि यदि दी गई रकम काल्पनिक हो या रकम इतनी कम हो कि वह एक प्रकार से संपत्ति का अधिग्रहण हो जाए तो व्यथित व्यक्ति परिवाद परिवाद कर सकता है। किंतु यह संभावना 44वें संशोधन ने मिटा दी है।

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