मूल अधिकारों में अपवाद
पश्चातवर्ती संशोधनों द्वारा मूल अधिकार की परिधि को, उनके प्रवर्तन में कुछ अपवाद डालकर संकीर्ण कर दिया गया है। ये हैं अनुच्छेद 31क , 31ख, 31ग, और 31घ ।
- इनमें से अनुच्छेद 31क और 31ग, अनुच्छेद 14 और 19 में प्रगणित मूल अधिकारों के अपवाद हैं। इसका अर्थ यह है कि अनुच्छेद 31क(कृषि सुधार के लिए विधि) या अनुच्छेद 31ग (संविधान के भाग 4 में अन्तविर्ष्ट निर्देशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधि) की परिधि में आने वाली विधि को न्यायालय इस आधार पर अविधिमान्य नहीं करता है कर सकता कि वह अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता) और अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति, संगम आदि की स्वतंत्रता) में प्रत्याभूत मूल अधिकारों का उल्लंघन करती है।
- अनुच्छेद 31ख भाग 3 में प्रगणित सभी मूल अधिकारों के लिए लगभग संपूर्ण अपवाद बनाता है। यदि कोई अधिनियम नौवीं अनुसूची में सम्मिलित किया गया है (जिसे अनुच्छेद 31ख के साथ पढ़ा जाएगा) तो ऐसी अधिनियमिति किसी भी मूल अधिकार के उल्लंघन के आधार पर सांविधानिक अविधिमान्यता से उन्मुक्त रहेगी।
किंतु 24-04-1973 (अर्थात केशवानंद के निर्णय की तारीख) के पश्चात उस पर इस आधार पर आक्षेप किया जा सकता है उससे संविधान की आधारभूत संरचना को क्षति पहुंच रही है।

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